Pratyay in Hindi | प्रत्यय की परिभाषा, भेद , उदहारण

Pratyay in Hindi | प्रत्यय की परिभाषा, भेद , उदहारण: हिंदी ग्रामर के एक और पाठ में आपका स्वागत है आज के पाठ में हम जानेंगे प्रत्यय किसे कहते हैं और प्रत्यय के प्रकार कितने हैं और प्रत्यय की परिभाषा

प्रत्यय की परिभाषा – Pratyay in Hindi

प्रत्यय वे शब्द हैं जो दूसरे शब्दों के अन्त में जुड़कर, अपनी प्रकृति के अनुसार, शब्द के अर्थ में परिवर्तन कर देते हैं। प्रत्यय शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – प्रति + अय। प्रति का अर्थ होता है ‘साथ में, पर बाद में” और अय का अर्थ होता है “चलने वाला”, अत: प्रत्यय का अर्थ होता है साथ में पर बाद में चलने वाला। जिन शब्दों का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता वे किसी शब्द के पीछे लगकर उसके अर्थ में परिवर्तन कर देते हैं।

प्रत्यय का अपना अर्थ नहीं होता और न ही इनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व होता है। प्रत्यय अविकारी शब्दांश होते हैं जो शब्दों के बाद में जोड़े जाते है।कभी कभी प्रत्यय लगाने से अर्थ में कोई बदलाव नहीं होता है। प्रत्यय लगने पर शब्द में संधि नहीं होती बल्कि अंतिम वर्ण में मिलने वाले प्रत्यय में स्वर की मात्रा लग जाएगी लेकिन व्यंजन होने पर वह यथावत रहता है।

जैसे:

  • समाज + इक = सामाजिक
  • सुगंध + इत = सुगंधित
  • मीठा + आस = मिठास
  • लोहा + आर = लुहार
  • नाटक + कार =नाटककार
  • बड़ा + आई = बडाई
  • बिक +आऊ = बिकाऊ
  • होन +हार = होनहार
  • लेन +दार = लेनदार
  • घट + इया = घटिया
  • दया +लु = दयालु

प्रत्यय के भेद

मूलतः प्रत्यय के दो प्रकार है-

  1. कृत् प्रत्यय (कृदन्त)
  2. तद्धित प्रत्यय

कृत् प्रत्यय

कृत् प्रत्यय की परिभाषा

क्रिया या धातु के अन्त में प्रयुक्त होनेवाले प्रत्ययों को ‘कृत्’ प्रत्यय कहते है और उनके मेल से बने शब्द को ‘कृदन्त’ कहते है।
दूसरे शब्दो में– वे प्रत्यय जो क्रिया के मूल रूप यानी धातु में जोड़ जाते है, कृत् प्रत्यय कहलाते है।

जैसे– लिख् + अक =लेखक। यहाँ अक कृत् प्रत्यय है तथा लेखक कृदंत शब्द है।
ये प्रत्यय क्रिया या धातु को नया अर्थ देते है। कृत् प्रत्यय के योग से संज्ञा और विशेषण बनते है। हिंदी में क्रिया के नाम के अंत का ‘ना’ (कृत् प्रत्यय) हटा देने पर जो अंश बच जाता है, वही धातु है। जैसे- कहना की कह्, चलना की चल् धातु में ही प्रत्यय लगते है।
कृत प्रत्यय से मिलकर जो प्रत्यय बनते है, उन्हें कृदंत प्रत्यय कहते हैं। ये प्रत्यय क्रिया और धातु को नया अर्थ देते हैं। कृत प्रत्यय के योग से संज्ञा और विशेषण भी बनाए जाते हैं। हिंदी में क्रिया के नाम के अंत का ‘ना’ (कृत् प्रत्यय) हटा देने पर जो अंश बच जाता है, वही धातु है।

जैसे– कहना की कह्, चलना की चल् धातु में ही प्रत्यय लगते है।

कृत प्रत्यय के भेद

  1. कर्तृवाचक कृत प्रत्यय
  2. कर्मवाचक कृत प्रत्यय
  3. करणवाचक कृत प्रत्यय
  4. भाववाचक कृत प्रत्यय
  5. विशेषणवाचक कृत प्रत्यय
  6. क्रियावाचक कृत प्रत्यय

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कर्तृवाचक कृत् प्रत्यय: कर्ता का बोध कराने वाले प्रत्यय कर्तृवाचक कृत् प्रत्यय कहलाते है।
दूसरे शब्दों में- जिस शब्द से किसी के कार्य को करने वाले का पता चले, उसे कर्तृवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं।
जैसे

  • अक = लेखक, नायक, गायक, पाठक
  • अक्कड = भुलक्कड, घुमक्कड़, पियक्कड़
  • आकू = लड़ाकू, कृपालु, दयालु

कर्मवाचक कृत् प्रत्यय: कर्म का बोध कराने वाले प्रत्यय कर्मवाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।
दूसरे शब्दों में- जिस प्रत्यय से बनने वाले शब्दों से किसी कर्म का पता चले उसे, कर्मवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं।
जैसे

  • औना = बिछौना, खिलौना
  • ना = सूँघना, पढना, खाना
  • गा = गाना।

करणवाचक कृत् प्रत्यय: करण यानी साधन का बोध कराने वाले प्रत्यय करणवाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।
दूसरे शब्दों में- जिस प्रत्यय की वजह से बने शब्द से क्रिया के करण का बोध होता है, उसे करणवाचक कृत प्रत्यय कहते हैं।
जैसे

  • आ = भटका, भूला, झूला
  • न = बेलन, झाडन, बंधन

भाववाचक कृत् प्रत्यय: क्रिया के व्यापार या भाव का बोध कराने वाले प्रत्यय भाववाचक कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।
दूसरे शब्दों में- भाववाचक कृत प्रत्यय वे होते हैं, जो क्रिया से भाववाचक संज्ञा का निर्माण करते हैं।
जैसे

  • अन = लेखन, पठन, गमन, मनन, मिलन
  • आवा = भुलावा, छलावा, दिखावा, बुलावा, चढावा

क्रियाद्योतक कृत् प्रत्यय:  जिन कृत् प्रत्ययों के योग से क्रियामूलक विशेषण, रखनेवाली क्रिया का निर्माण होता है, उन्हें क्रियाद्योतक कृत् प्रत्यय कहते हैं।
दूसरे शब्दों में- जिस प्रत्यय के कारण बने शब्दों से क्रिया के होने का भाव पता चले, उसे क्रिया वाचक कृत प्रत्यय कहते हैं।
जैसे

  • ता = डूबता, बहता, चलता
  • या = खोया, बोया
  • कर = जाकर, देखकर

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तद्धित प्रत्यय

तद्धित प्रत्यय की परिभाषा

संज्ञा सर्वनाम और विशेषण के अन्त में लगने वाले प्रत्यय को ‘तद्धित’ कहा जाता है और उनके मेल से बने शब्द को ‘तद्धितान्त’।
दूसरे शब्दों में – धातुओं को छोड़कर अन्य शब्दों में लगनेवाले प्रत्ययों को तद्धित कहते हैं। जब संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण के अंत में प्रत्यय लगते हैं, उन शब्दों को तद्धित प्रत्यय कहते हैं।
जैसे

  • मानव + ता = मानवता
  • अपना + पन = अपनापन

कृत-प्रत्यय क्रिया या धातु के अन्त में लगता है, जबकि तद्धित प्रत्यय संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण के अन्त में। तद्धित और कृत-प्रत्यय में यही अन्तर है। उपसर्ग की तरह तद्धित-प्रत्यय भी तीन स्रोतों- संस्कृत, हिंदी और उर्दू से आकर हिन्दी शब्दों की रचना में सहायक हुए है।

तद्धित प्रत्यय के भेद –

  1. कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय
  2. भाववाचक तद्धित प्रत्यय
  3. संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय
  4. गणनावाचक तद्धित प्रत्यय
  5. गुणवाचक तद्धित प्रत्यय
  6. स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय

कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय: कर्ता का बोध कराने वाले प्रत्यय कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं। जिन प्रत्यय को जोड़ने से कार्य को करने वाले का बोध हो, उसे कर्तृवाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं।
संज्ञा के अन्त में आर, इया, ई, एरा, हारा, इत्यादि तद्धित-प्रत्यय लगाकर कर्तृवाचक तद्धितान्त संज्ञाएँ बनायी जाती हैं।
जैसे

  • पालन + हार = पालनहार
  • चित्र + कार = चित्रकार

भाववाचक तद्धित प्रत्यय: भाव का बोध कराने वाले प्रत्यय भाववाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं। जो प्रत्यय संज्ञा तथा विशेषण के साथ जुडकर भाववाचक संज्ञा को बनाते हैं, उसे भाववाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं।
संज्ञा के अन्त में आ, आयँध, आई, आन, आयत, आरा, आवट, आस, आहट, ई, एरा, औती, त, ती, पन, पा, स इत्यादि तद्धित-प्रत्यय लगाकर भाववाचक तद्धितान्त संज्ञाएँ बनायी जाती हैं।
जैसे

  • बुलाव + आ = बुलावा
  • ऊँचा + आई = ऊँचाई

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संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय: संबंध का बोध कराने वाले प्रत्यय संबंधवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं। जिन प्रत्ययों के लगने से संबंध का पता लगता है, उसे संबंध वाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं। इसमें कभी-कभी आदि स्वर की वृद्धि हो जाती है।
संज्ञा के अन्त में आल, हाल, ए, एरा, एल, औती, जा इत्यादि तद्धित-प्रत्यय लगाकर सम्बन्धवाचक तद्धितान्त संज्ञाएँ बनायी जाती हैं।
जैसे

  • चाचा + ऐरा = चचेरा
  • बहन + जा = भानजा

गणनावाचक तद्धित प्रत्यय: संख्या का बोध कराने वाले प्रत्यय गणनावाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते है। जिन प्रत्ययों को जोड़ने से शब्दों में संख्या का पता चले उसे गणना वाचक तद्धित प्रत्यय कहते हैं।
संज्ञा-पदों के अंत में ला, रा, था, वाँ, हरा इत्यादि प्रत्यय लगाकर गणनावाचक तद्धितान्त संज्ञाए बनती है।
जैसे

  • पह + ला = पहला
  • दुस + रा = दूसरा

गुणवाचक तद्धित प्रत्यय: गुण का बोध कराने वाले प्रत्यय गुणवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं। जिन प्रत्ययों के प्रयोग से पदार्थ के गुणों का बोध होता है, उसे गुणवाचक प्रत्यय कहते हैं। इस प्रत्यय से संज्ञा शब्द गुणवाची हो जाता है।
संज्ञा के अन्त में आ, इत, ई, ईय, ईला, वान इन प्रत्ययों को लगाकर गुणवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं।
जैसे

  • मीठ + आ = मीठा
  • इतिहास + इक = ऐतिहासिक

स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय: स्थान का बोध कराने वाले प्रत्यय स्थानवाचक तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं। जिन प्रत्ययों के प्रयोग से स्थान का पता चलता है, वहाँ पर स्थान वाचक तद्धित प्रत्यय होता है।
संज्ञा के अन्त में ई, वाला, इया, तिया इन प्रत्ययों को लगाकर स्थानवाचक संज्ञाएँ बनायी जाती हैं।
जैसे

  • जर्मन + ई = जर्मनी
  • चाय + वाला = चायवाला

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तो दोस्तों यहां पर हम हमारी Pratyay in Hindi | प्रत्यय की परिभाषा, भेद , उदहारण की पूरी जानकारी को समाप्त करते हैं आशा करते हैं कि आपको Pratyay in Hindi, प्रत्यय की परिभाषा के बारे में पूरी जानकारी मिल गई हो. अगर आपको हिंदी ग्रामर संबंधी और भी किसी प्रकार की जानकारी चाहिए तो आप हमें कमेंट में पूछ सकते हैं हम आपको रिप्लाई जरूर देंगे.

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